मऊ – कहते हैं कि इंसान को अपनी जिंदगी गुज़ारने के लिए तीन चीजें जरूरी हैं, रोटी, कपड़ा और मकान
लेकिन पहनने के लिए साड़ी तैयार कर लोगों के तन ढ़कने वाला बुनकर आज मंदी की मार से रोटी कपड़ा और मकान के लिए लोहे के चने चबाने जैसा हो गया है।
पहले नोटबंदी जीएसटी और अब आर्थिक मंदी ने साड़ी उद्योग की कमर तोड़ दी है
सरकार भले ही सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास का नारा दे रही हो लेकिन इस मंदी की मार में आज ना तो बुनकरों का विकास हो रहा है और ना ही सरकार द्वारा बुनकरों के लिए विशेष योजना या घोषणा की जा रही, बिजली पासबुक खत्म होने के बाद दिन ब दिन बिजली विभाग द्वारा चेकिंग के नाम पर बुनकरों का उत्पीड़न किया जा रहा, जिससे बुनकरों की कमर टूटती जा रही है।
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य अल्ताफ अंसारी का कहना है कि देश के प्रधानमंत्री और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री जिस क्षेत्र से सांसद चुने गए हैं वहां पर बड़ी संख्या में बुनकर निवास करते हैं और लोगों का शरीर ढ़कने के लिए साड़ियां तैयार करते हैं लेकिन इस मंदी के दौर में इन बदहाल बुनकरों की खबर लेने वाला कोई नहीं है।
अपना कोई स्थानीय प्रतिनिधि ना होने से देश की सबसे बड़ी पंचायत में इन बुनकरों की आवाज़ उठाने वाला भी कोई नहीं है जो बुनकरों की समस्याओं से अवगत कराए।
साड़ी बनाने वाले मैटेरियल का दाम बढ़ता जा रहा है लेकिन साड़ियों का दाम में कोई वृद्धि नहीं हो रही जिससे बुनकरों की मज़दूरी भी नहीं बढ़ रही।
अल्ताफ अंसारी ने सरकार से मांग की है कि बुनकरों के हित को देखते हुए अन्नदाता किसानों की तरह बुनकरों को भी सुविधाएं दी जाएं या जिस तरह कोई आपदा आने पर वहां के निवासियों के लिए शिक्षा, बिजली जैसी आवश्यक सुविधाएं फ्री दी जाती हैं वैसे ही बुनकरों के लिए भी इस आपदा की घड़ी में ये सुविधाएं मुफ्त में दी जाएं क्योंकि मंदी के इस दौर में बुनकर भुखमरी के कगार पर पहुंच रहे हैं।
साड़ियों की बिक्री कम होने से प्रोडक्शन भी कम हो रहा है, जिसकी वजह से साड़िया तैयार करने वाले बुनकरों को उनके रोजगार से हाथ धोना पड़ रहा है और अपने परिवार का पेट पालने के लिए इनके माथे पर चिंता की लकीरें बढ़ती जा रही हैं।
मऊ के अधिकतर इलाकों में पावर लूम की खटर पटर के बीच साड़ी उद्योग फलता-फूलता नजर आता है, मशीनों की खटर-पटर और ताने-बाने पर चढ़े धागों से तैयार हो रही साड़ियों को देखकर हर कोई तो यही सोचता है कि यह कारोबार बुलंदियों पर पहुंच चुका है, लेकिन सच्चाई बिल्कुल अलग है। हालात यह हैं कि मंदी के दौर में कोलकाता महाराष्ट्र और साउथ इंडिया से मिलने वाले ऑर्डर कम होने की वजह से अब साड़ी कारोबार से जुड़े-बड़े व्यापारी न चाहते हुए भी बुनकरों की संख्या कम कर रहे हैं, जिसका खामियाजा इन बुनकरों को भुगतना पड़ रहा है, जिससे इन बुनकरों के सामने खाने-पीने का संकट खड़ा हो रहा है।
अल्ताफ अंसारी का कहना है कि जब से बीजेपी की सरकार आई तब से साड़ी उद्योग ने दम तोड़ दिया है. पहले नोटबंदी कर इस व्यापार को चौपट किया गया फिर जीएसटी लगाकर कपड़ा उद्योग को बर्बादी के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया गया. कुछ उबरने की कोशिश व्यापार कर ही रहा था कि मंदी ने कदम रख दिया. अब हालात यह हैं कि त्योहारी मौसम होने के बाद भी साड़ी उद्योग अब तक खड़ा नहीं हो पाया है। सरकार ने अगर वक्त रहते इसकी ओर ध्यान नहीं दिया तो शायद साड़ी कारोबार की यह पहचान, जिसने देश नहीं विदेशों में भी भारत का सर ऊंचा किया है वह दम तोड़ देगी

पहले नोटबंदी जीएसटी और अब आर्थिक मंदी ने साड़ी उद्योग की कमर तोड़ दी, सरकार बुनकरों की तरफ भी ध्यान दे: अल्ताफ अंसारी
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